जिसे जिन्दगी का मर्म समझ आ गया मानो जीना आ गया

जिसे जिन्दगी का मर्म समझ आ गया मानो जीना आ गया

एक सज्जन ने अपना अनुभव साँझा किया है   एक बार यात्रा के दौरान एक बुज़ुर्ग महात्मा जी से मुलाक़ात हुई. मैंने प्रणाम किया और उनके पास बैठ गया. काफी द...

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एक सज्जन ने अपना अनुभव साँझा किया है

 

एक बार यात्रा के दौरान एक बुज़ुर्ग महात्मा जी से मुलाक़ात हुई.

मैंने प्रणाम किया और उनके पास बैठ गया. काफी देर चुप रहने के बाद मैंने गुज़ारिश की.. कि जिंदगी की कोई नसीहत दीजिये मुझे….

 

उन्होंने गौर से मुझे देखा और अज़ीब सा सवाल किया कि ‘कभी बर्तन धोये हैं’ ?

 

मैं उनके सवाल पर हैरान हुआ और सर झुका कर कहा कि.. जी धोये हैं.

पूछने लगे..

क्या सीखा??

मैंने कोई जवाब नही दिया…

वो मुस्कुराये और कहने लगे…

“बर्तन को बाहर से कम और अंदर से ज्यादा धोना पड़ता है….. बस यही जिंदगी है.

 

सच में जिन्दगी की यही सच्चाई है हमें औरों की कमियां ढूंढने की बजाय खुद को अन्दर से धोना चाहिए. जिन्दगी का यही मर्म है.

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