इतिहास का वो काला अध्याय- 13 अप्रैल 1919, जानिए क्या हुआ था उस दिन? रो पड़ोगे इतिहास पढ़कर

इतिहास का वो काला अध्याय- 13 अप्रैल 1919, जानिए क्या हुआ था उस दिन? रो पड़ोगे इतिहास पढ़कर

13 अप्रैल 1919 का दिन- बैसाखी का पावन पर्व, आज से ठीक 99 साल पहले हमेशा की तरह एक चमकीली सुबह. सूर्योदय के साथ ही लोग जलियांवाला बाग़ में बैसाखी पर्व औ...

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13 अप्रैल 1919 का दिन- बैसाखी का पावन पर्व, आज से ठीक 99 साल पहले हमेशा की तरह एक चमकीली सुबह. सूर्योदय के साथ ही लोग जलियांवाला बाग़ में बैसाखी पर्व और नववर्ष के जश्न के लिए इक्कट्ठा होना शुरू हुए थे. उनके साथ शांतिमार्च के लिए लाहौर से आए लोग भी बैसाखी के जश्न के लिए जालियांवालाबाग में इकट्ठे हो रहे थे. किसी को भान तक नहीं था की ये दिन उनकी जिन्दगी का और इतिहास का सबसे काला दिन बनने वाला है. सब अपनी-अपनी तैयारियों में मस्त थे. सब बड़े-बुड्ढे, बच्चे, युवा और महिलायें, सभी एक दुसरे से परस्पर प्रेम- हंसी-मजाक कर रहे थे और एक दुसरे को बैसाखी-नववर्ष की बधाई दे रहे थे. स्वर्णमंदिर के पास स्थित बाग में हरमिंदर साहब के भक्तों के साथ ही किसान, व्यापारी और पारिवारिक लोग मेला देखने आए थे.

जनरल डायर- एक क्रूरतम अंग्रेज अधिकारी, उसे जैसे ही पता चला की जलियांवाला बाग़ में लोग इकट्ठे हो रहे हैं, अचानक अपने सिपाहियों के साथ वहां पहुँच गया. उसने बाग़ को चारों तरफ से घेर लिया. बाग़ की बनावट कुछ ऐसी थी की वहां आने जाने के लिए केवल एक ही गेट था. उसे भी जनरल आर डायर की सेना ने घेर लिया. हर तरफ लोगों के घर थे और ऊँची- ऊँची दीवारें. बाग़ में तकरीबन 25 हज़ार लोग मौजूद थे, बेफिक्र-मस्त! कुछ ही पलों बाद आने वाले मानव इतिहास  के भयानक जनसंहार से अनजान.

शाम के लगभग साढ़े चार बजे अंग्रेज जनरल आर डायर ने अचानक, बिना किसी चेतावनी के- वहां मौजूद निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाने का हुक्म दे डाला. दनदनाती गोलियां वहां मौजूद मासूम लोगों का सीना चीरने लगी, चारों ओर भगदड़ मच गई. चीखो-पुकार करते लोग अपनी जान बचाने को इधर-उधर भागने लगे. कोई चारा नहीं- चारों तरफ ऊँची दीवारें, बीच में कुआं और मुख्य द्वार पर गोलियां चलाती निर्दयी सेना.   गोलियां तब तक चलती रही जब तक खत्म नहीं हो गई. बाग़ की मिट्टी खून से लाल हो गई, लाशों का अम्बार लग गया, कुआं लाशों से उफान मारने लगा.

मानव इतिहास में हुए सबसे भयानक जनसंहारों में से एक- अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में करीब दस मिनट तक ये खुनी खेल बिना रुके चलता रहा. हज़ारों लोग थोड़ी ही देर में लाशों के ढेर में तब्दील हो गए- कुछ जान बचाने को भागते लोगों के पैरों तले कुचले गए. अंग्रेजी हुकूमत के रिकॉर्ड के अनुसार 379 लोगों की मौत हो गई लेकिन वास्तविक आंकड़ा हज़ार से ऊपर था और घायल होने वालों की संख्या दो हज़ार से भी ऊपर थी. अमृतसर में उस दिन कर्फ्यू होने की वजह से लाशें दुसरे दिन तक वहीँ पड़ी रही, और कर्फ्यू की वजह से चिकित्सा सहायता ना मिल पाने के कारण घायलों ने तड़फ-तड़फ कर दम तोड़ा. इस भयानक हादसे ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया.

COMMENTS

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    So sad 😌😌😌😌