आओ वास्तु सीखें भाग 4: वास्तु में ढलान का महत्व, सही दिशा में ढलान करेगी आपको मालामाल

आओ वास्तु सीखें भाग 4: वास्तु में ढलान का महत्व, सही दिशा में ढलान करेगी आपको मालामाल

वास्तु विज्ञान बहुत सरल है जिसे कोई भी व्यक्ति महज कुछ समय में ही सीख सकता है और ये इतना शक्तिशाली है की इसको सीखने के बाद आप यक़ीन मानिए, आपके लिए दु...

आओ वास्तु सीखें-5: किस दिशा में कितनी जगह छोड़कर घर बनायें और इसके वास्तु दोष दूर करने के उपाय
आओ वास्तु सीखें-3: प्राकृतिक शक्तियों के संतुलन से अपने भाग्य के निर्माता स्वयं बने
आओ वास्तु सीखें -भाग 2: वास्तु के अनुसार दिशाओं का ज्ञान और उनका महत्व

वास्तु विज्ञान बहुत सरल है जिसे कोई भी व्यक्ति महज कुछ समय में ही सीख सकता है और ये इतना शक्तिशाली है की इसको सीखने के बाद आप यक़ीन मानिए, आपके लिए दुनिया में कुछ भी करना असंभव नही रहेगा. हम चाहते है की आप सभी, मेरे प्रिय पाठक इस विज्ञान को सीखें और ना सिर्फ अपनी परेशानियों को स्वयं दुर करने में सक्षम बने बल्कि अपने मित्र और रिश्तेदारों का भी मार्गदर्शन करें. आप थोड़ी से मेहनत करके मात्र तीन महीनों में ही वास्तु में पारंगत हो जायेंगे, ऐसा हमारा विश्वास है.vastu me dhlaan ka mahtav

वास्तु विज्ञान में ढलान का सर्वाधिक महत्व है अगर आपके घर, प्रतिष्ठान या फ़ैक्टरी की भूमि या छत का ढलान सही दिशा में हैं तो उसके आधे वास्तु दोष स्वत: ही दुर हो गए, ऐसा मानना चाहिए. बात ढलान की है तो फिर ढलान चाहे किसी कमरे के फर्श का हो, भूमि का हो, छत का हो, टीन शेड का हो या फिर घर के बाहर रोड़ का हो.

सभी तरह की ढलान का वास्तु विज्ञान में एक ही सिम्पल फ़ार्मूला है की ढलान हमेशा उत्तर, पुर्व या ईशान कोण में ही होना चाहिए. इस हिसाब से सबसे नीचा ईशान कोण(NE), ईशान से ऊँचा वायव्य कोण (NW) और वायव्य से ऊँचा अग्निकोण (SE) तथा अग्निकोण से ऊँचा नैऋत्य कोण (SW) होना शुभ रहता है अर्थात पुरा ढलान नैऋत्य कोण से ईशान कोण की तरफ़ होना चाहिए.

आप जिस घर में रहते हैं या जिस बैडरूम में सोते हैं तुरन्त उसके फर्श का ढलान चैक किजिए अगर यह दक्षिण, पश्चिम, वायव्य या आग्नेय दिशा में हैं तो यह शुभ नही है क्यों की धीरे धीरे आपका स्वास्थ्य और धन इससे नष्ट हो जायेगा और आपको पता भी नही चलेगा.vastu me dhlaan ka mahtav

ध्यान देने योग्य: किसी भी चीज़ का आधा ढलान शुभ और आधा अशुभ हो यानि आधा पुर्व व आधा पश्चिम या आधा उत्तर व आधा दक्षिण तो ऐसा चल सकता है क्योंकी जो भूमि बीच में से ऊँची व चारों तरफ़ से नीची हो उसे वास्तु की द्रष्टि से शुभ माना जाता है.

 

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