धर्म के नाम पर जनता की आस्था से खिलवाड़ कर रहे तथाकथित बाबा, जिम्मेदार कौन?

धर्म के नाम पर जनता की आस्था से खिलवाड़ कर रहे तथाकथित बाबा, जिम्मेदार कौन?

भारतभूमि को देव भूमि भी कहा जाता है. सदियों से इस पवित्र भूमि पर ऐसे हज़ारों ऋषि-मुनि हुए हैं जिन्होंने संसार को एक नई दिशा दी. उनके सुझाये रास्ते पर च...

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भारतभूमि को देव भूमि भी कहा जाता है. सदियों से इस पवित्र भूमि पर ऐसे हज़ारों ऋषि-मुनि हुए हैं जिन्होंने संसार को एक नई दिशा दी. उनके सुझाये रास्ते पर चलकर इस दुनिया ने नित नई बुलंदियों को छूआ है. तब से लेकर आज तक संत- महात्माओं के प्रति जनमानस में आस्था और सम्मान बना हुआ है. इसी का फायदा उठाने के लिए एक बहुत बड़ी जमात खड़ी हो गई है जिन्हें समाज ‘बाबा’ के नाम से जानता है. इनके पास बहुत बड़े डेरे से लेकर ऐशोआराम के तमाम बंदोबस्त होते है. इस भीड़ में कौन सच्चा है और कौन झूठ का सहारा लेकर आम जनता की भावना से खिलवाड़ कर रहा है, इसका पता लगाना काफी मुश्किल हो जाता है.

अभी हाल ही के कुछ मामलों पर नज़र डाली जाये तो हम देखते हैं कि भौतिक संसार की तमाम सुख-सुविधा को छोड़ देने का ढोंग करने वाले बाबाओं के राजसी ठाट-बाट भरे जीवन और उस पर उनके ऐसे-ऐसे कारनामे जिन्हें देखकर खुद शर्म को भी शर्म आ जाये, नित सामने आ रहे हैं. वर्तमान समय में इन धर्म के ठेकेदारों और तथाकथित बाबाओं ने आम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके इनकी आस्था को ठेस पहुंचाई है उससे ना केवल आम आदमी प्रभावित हुआ है बल्कि धर्म के नाम से भी उनका विश्वास टुटा है.

पिछले कई सालों से एक के बाद एक ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने आते रहे हैं जिन्होंने लोगों के विश्वास को तोड़ा है और साथ ही सत्य के राह पर चलने वालों को भी शक के कटघरे में खड़ा कर दिया है. चाहे आशाराम हो, राम रहीम हो, रामपाल या फिर पर इच्छाधारी बाबा भीमानन्द महाराज या कोई और, इनकी फेहरिस्त बहुत लम्बी है. सबने एक ही काम किया- धर्म के नाम पर धब्बा लगाने का. आखिर क्यूँ? क्यूँ ये लोग आम जनता की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे है? इनके कारनामों का भेद खुलने के बाद जब जनता को धर्म के नाम पर ठगे जाने का एहसास होता है तो क्या उस जनता का विश्वास फिर लौट सकता है? अगर नहीं तो उन्हें क्या अधिकार है कि जनता के विश्वास को खंडित करने का? उन्हें क्या अधिकार है धर्म और आस्था के नाम पर आम जनता को गुमराह करने का?

लेकिन सारे मामलों का अध्ययन करने के बाद एक ही ज्वलंत प्रशन खड़ा होता है की आखिर इस प्रकार के मामलों का जिम्मेदार कौन है? तथाकथित बाबाओं के पीछे उमड़ती भीड़ को देखकर लगता है कि अभी जनता समझदार होने के मूड में नहीं है. भारतवर्ष में धर्म के नाम पर दुकानदारी या आस्था से खिलवाड़ करने वालों की कमी नहीं है और जनता भी सच्चे-झूठे की पहचान की कोशिश किये बगैर आँख बंद करके इनके पीछे लग जाती है. जब तक धर्म के नाम पर शोषण या आस्था से खिलवाड़ करने वालों के विरुद्ध कोई कठोर कानून नहीं बन जाए इनकी दुकानदारी ऐसे ही चलती रहेगी और जनता एक के बाद दुसरे और फिर तीसरे बाबा के पीछे घूमती रहेगी.

इस प्रकार के बाबाओं पर शिकंजा कसने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?

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