जानिए कैसे बनाती है फेसबुक जैसी कंपनियां आपको बेवकूफ, कैसे होता है आपकी निजी जानकारी का दुरूपयोग?

जानिए कैसे बनाती है फेसबुक जैसी कंपनियां आपको बेवकूफ, कैसे होता है आपकी निजी जानकारी का दुरूपयोग?

दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक आजकल 5 करोड़ यूजर्स के डाटा लीक मामले में विवादों में घिरा हुआ है. इस मामले में कैंब्रिज ऐनालिटिका पर ...

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दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक आजकल 5 करोड़ यूजर्स के डाटा लीक मामले में विवादों में घिरा हुआ है. इस मामले में कैंब्रिज ऐनालिटिका पर आरोप है कि उसने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के चुनावों में वोटर्स की राय को मैनिप्युलेट करने के लिए फेसबुक यूजर्स डेटा में सेंध लगाई. इस मामले में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से जवाब तलब किया गया है. इस तमाम घटनाक्रम को सीधे तौर से देखने पर ये मामला साधारण सा नज़र आता है लेकिन असल में कितना गंभीर है इसे समझने के लिए आप ध्यान पूर्वक इस आर्टिकल को पढ़िए-

क्या आपने कभी गौर किया है कि फेसबुक पर कई बार ऐसे इनबिल्ट मैसेज आते है जिन पर ये बताने का दावा किया होता है की आपकी मृत्यु कब या कैसे होगी, आप आज से 10-20 साल बाद कैसे दिखेंगे या ऐसे फ़ालतू के सवाल जैसे कि आप अगले जन्म में क्या बनेंगे या फिर आप किस हीरो जैसे दिखते है वगैरा-वगैरा. क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसे टाइमपास से नज़र आने वाले सवालों की एप्प्स कोई कैसे और क्यूँ बनाता है? नहीं ना, लेकिन इस सबके पीछे होता है कैंब्रिज ऐनालिटिका जैसी विदेशी कंपनियों का माइंड. आपको पता भी नहीं चलता और आप टाइमपास के चक्कर में अपनी राय या निजी जानकारियाँ डाटा कलेक्शन के बिज़नस में उतरी कंपनियों से शेयर कर लेते हो या उन्हें आपके अकाउंट से जुडी जानकारी रीड करने की परमिशन दे देते हो. आपकी नज़र में आपकी राय की कोई कीमत नहीं होती लेकिन उनके लिए यह किसी बेशकीमती खजाने के कम नहीं होती.

इन विदेशी कंपनियों को अच्छी तरह से पता होता है कि भारतीय लोग इस प्रकार की बेतुकी एप्प्स या धार्मिक पोस्टों के जरिये जल्दी और प्रभावी तरीके से भ्रमित हो जाते है. भारत जैसे देश में जहाँ इन्टरनेट की दुनिया के क-ख से यहाँ का शिक्षित वर्ग भी अभी तक अनजान है, यहाँ के औसत बुद्धि वाले लोग उनके भ्रमजाल में बहुत आसानी से फंस कर अपनी जानकारियां एक के बाद एक उन्हें देते चले जाते हैं. फिर ऐसी बेतुकी एप्लीकेशन या पोस्ट्स के जरिये आपकी प्राईवेसी में संध लगा चुकी कंपनी सारा डाटा इकट्ठा कर लेती है.

इस बात को हम एक उदहारण के जरिये समझ सकते है, मान लो तीन फेसबुक के यूजर है जिनमें पहला यूजर A है और वो 25 वर्ष का है, दूसरा B है और वो बुज़ुर्ग है 60+ का इसी तरह से तीसरा यूजर C एक लड़की है और 20 साल की है. अब तीनों द्वारा फेसबुक की एक साथ ब्राउज़िंग के दौरान लड़की C को कॉस्मेटिक प्रोडक्ट की ऐड दिखाई देगी जबकि A को गाड़ी की या फेंसी किसी आइटम्स की ऐड नज़र आएगी जबकि B को मधुमेह या घुटने/जोड़ के दर्द की दवा की ऐड. दरअसल इनका अल्गोरिद्म डेवेलोप्मेंट इस तरह से तैयार किया हुआ होता है कि इन्हें यूजर्स की पसंद और नापसंद की पूरी जानकारी होती है और उसी हिसाब से ये आपकी जानकारी या रूचि के अनुसार आपको सामग्री परोसते हैं. अगर आप गेम खेलने के शौक़ीन हैं तो आपको गेम्स की एप्लीकेशन की ऐड ही शो करेंगे. इसी तकनीक का इस्तेमाल कर ये कंपनियां हमारी टाइमलाइन पर भी किसी ख़ास पार्टी की पोस्ट को सज्जेस्ट करती है या किसी ख़ास पोस्ट को हमारी नज़रों के सामने बार-बार रिपीट करती है और आखिर में यूजर का ब्रेनवाश करने में सफल हो जाती है.

कैंब्रिज ऐनालिटिका में काम कर चुके क्रिस्टोफर विली के अनुसार उनकी कंपनी ने 5 करोड़ अमेरिकियों का फेसबुक डाटा एक्सेस करके उसका इस तरीके से अनालिसिस किया गया कि अधिक से अधिक लोगों का ब्रेनवाश हो और वो ट्रम्प के पक्ष वोटिंग करें. इसके लिए उन्होंने लोगों को ट्रम्प के पॉजिटिव विज्ञापन भी भरपूर दिखाए और अपने मकसद में कामयाब भी रही.

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