कितनी सार्थक रही है धरने की राजनीति? और भी हैं बेहतर विकल्प

कितनी सार्थक रही है धरने की राजनीति? और भी हैं बेहतर विकल्प

आजकल किसी मुद्दे पर विपक्ष को घेरना हो या सरकार से अपनी कोई मांगे मनवानी हो, धरना सबके लिए एक सबल हथियार बन चुका है. गांधी जी के ज़माने से लेकर केजरीवा...

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आजकल किसी मुद्दे पर विपक्ष को घेरना हो या सरकार से अपनी कोई मांगे मनवानी हो, धरना सबके लिए एक सबल हथियार बन चुका है. गांधी जी के ज़माने से लेकर केजरीवाल के ज़माने तक और अब उससे भी आगे, धरना- राजनीति का पर्याय बन चुका है. देश में दलितों के खिलाफ अत्याचार के नाम पर कांग्रेस का छोले-भटूरे वाला धरना(उपवास) हो या मोदी जी का हाल में आयोजित बजट सत्र में विपक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही नहीं चलने के विरोध में 12 अप्रैल का उपवास. धरना-उपवास आजकर एक ट्रेंड बनता जा रहा है.
2019 के चुनावों के मद्देनज़र देश में धरना और उपवास की राजनीति तेज होती जा रही है. आजकल किसी भी पार्टी का कोई भी छोटा-बड़ा नेता हो, अपनी मांगों के समर्थन में झट से धरने पर बैठ जाता है. बैठे भी क्यों नहीं? ये हमारा अधिकार है की कोई भी कही भी और कभी भी बैठ सकता है. लेकिन फिर शुरू होता है भोली भाली जनता को गुमराह करके अपनी राजनितिक रोटियाँ सेंकने का धंधा. जनता (कुछ रेडीमैड दंगा-हंगामा स्पेशलिस्ट) भी अपने लाडले नेता के साथ सरकार को घुटने के बल ला देने की कसमें खाकर उत्पात करते हैं और कुछ ही समय में उस इलाके को अतिसंवेदनशील बना कर ही दम लेते है.
किसन बापट बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे का आमरण अनशन तो आपको याद ही होगा? जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने के लिये अन्ना ने 16 अगस्त 2011 से आमरण अनशन आरम्भ किया था और ऐसे ही कार्यक्रमों ने जन्म दिया केजरीवाल जैसे कद्दावर नेताओं को. सुचना का अधिकार अधिनियम के लिए अन्ना हजारे का आमरण अनशन पर आने वाले सालों तक याद किया जायेगा. क्या आज के नेता जो जनता जनार्दन से चुनकर गए होते है, इतने बेबस और निरीह हो गए कि उन्हें अपनी मांग मनवाने के लिए धरने का सहारा लेना? क्या धरने और उपवास से किसी समस्या का समाधान हो पायेगा? शायद नहीं. लेकिन आजकल धरने और उपवास की राजनीति एक ट्रेंड बनती जा रही है जनता को महज भ्रमित करने का काम ही कर रही है. सरकार की किसी नीति का विरोध करना हो या किसी विशेष मुद्दे पर सरकार की खिंचाई करनी हो, विपक्ष केवल धरना या उपवास ही कर सकता है क्या? विपक्ष द्वारा की जा रही ऐसी ओछी और घृणित राजनीति ना जाने कब बंद होगी?

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