क्या आपको पता है भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन क्यूँ किया जाता है? ये है असली कारण

क्या आपको पता है भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन क्यूँ किया जाता है? ये है असली कारण

गणेश चतुर्थी के त्यौहार को देशभर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन दक्षिण भारत में इस उत्सव का कुछ विशेष महत्व है. खासकर महाराष्ट्र में इस मौके प...

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गणेश चतुर्थी के त्यौहार को देशभर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन दक्षिण भारत में इस उत्सव का कुछ विशेष महत्व है. खासकर महाराष्ट्र में इस मौके पर खूब रौनक देखने को मिलती है. मुम्बई शहर के गणेश चतुर्थी के त्यौहार पर सजने वाले बप्पा के पंडाल देशभर में खासे मशहूर हैं.विसर्जन

आम लोगों से लेकर बॉलीवुड तक में बप्पा की मूर्ति को घर में लाने के लिए और उन्हें घर में स्थापित करने का कार्यक्रम बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. गणपति बप्पा को यथाशक्ति धर में रखा जाता है और फिर डेढ़ से दो दिन या फिर पांच, सात अथवा नौ दिन उन्हें घर में रखा जाता है और फिर उनका विसर्जन किया जाता है. लेकिन क्या आपको पता है की भगवान गणेश जी की प्रतिमा को विसर्जित क्यूँ किया जाता है?

गणेश जी को विसर्जित किये जाने के पीछे एक रोचक कथा है जिसका विवरण हमें धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है. कथा के अनुसार श्री वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे श्री गणेश जी ने अक्षरश: लिखा था. 10 दिन बाद जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत बढ़ गया है. तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के सरोवर में ले जाकर ठंडे पानी से स्नान कराया था. इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है.

कथा में यह भी वर्णन आता है कि श्री वेदव्यास जी ने गणपति जी के शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए उनके शरीर पर सुगन्धित माटी का लेपन किया. जैसे ही माटी ने सूखना शुरू किया गणपति जी के शरीर में अकड़न आ गई और माटी झड़ने भी लग गई. तब वेदव्यास जी ने उन्हें फिर शीतल पानी में उतारा. कहा जाता है कि वेदव्यास जी ने 10 दिनों तक श्री गणेश को मनपसंद आहार अर्पित किए तभी से प्रतीकात्मक रूप से श्री गणेश प्रतिमा का स्थापन और विसर्जन किया जाता है और 10 दिनों तक उन्हें सुस्वादु आहार चढ़ाने की भी प्रथा है.

विसर्जन

एक दूसरी मान्यता के मुताबिक गणपति उत्सव के दौरान भगवान को लोग अपनी इच्छा पूर्ति की कामना उनके कानों में कहते हैं. उनकी स्थापना के बाद भगवान लोगों की इच्छाएं सुन-सुनकर इतना गर्म हो जाते हैं की उन्हें शीतल करने के लिए चतुर्दशी को बहते हुए जल में उनका विसर्जन किया जाता है.

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