इतिहास की गजब घटना: लाखों का माल लेकर चली थी ट्रेन, …और अब चार साल बाद पहुंची मंजिल पर

इतिहास की गजब घटना: लाखों का माल लेकर चली थी ट्रेन, …और अब चार साल बाद पहुंची मंजिल पर

भारत में ट्रेनों का लेट होना कोई नई बात नहीं है, कई बार घंटों-घंटों तक ट्रेन लेट रहती है लेकिन कोई ख़ास चर्चा वाली बात नहीं होती. लेकिन क्या आप सोच भी ...

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भारत में ट्रेनों का लेट होना कोई नई बात नहीं है, कई बार घंटों-घंटों तक ट्रेन लेट रहती है लेकिन कोई ख़ास चर्चा वाली बात नहीं होती. लेकिन क्या आप सोच भी सकते हैं की कभी कोई ट्रेन चार साल लेट भी हो सकती है? नही ना. लेकिन ऐसा सच में ही हुआ है. गनीमत की बात ये है की आख़िरकार ट्रेन अपनी मंजिल पर पहुंची तो सही. इस ट्रेन को 1400 किलोमीटर का सफ़र तय करके जहाँ केवल 42 घंटों बाद अपनी मंजिल तक पहुंचना था वहीँ ये चार साल तक अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाई. कहाँ रही बीच के चार साल तक? आसमान खा गया या फिर धरती निगल गई?

दरअसल, भारत सरकार की कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड ने डीएपी मंगवाने के लिए साल 2014 में ट्रेन बुक किया था. इस मालगाड़ी को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम से 14 लाख रुपये कीमत की डीएपी खाद लेकर उत्तर प्रदेश के बस्ती पहुंचाना था. यह ट्रेन 10 नवंबर 2014 को विशाखापतनम से डि-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) खाद की बोरियां भरकर ऐसी चली की फिर कभी किसी को नज़र ही नहीं आई. यह दूरी महज 42 घंटे 13 मिनटों की है लेकिन 42 घंटे तो दूर 42 दिन बाद भी ये मालगाड़ी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाई.

जब अचानक यह ट्रेन 25 जुलाई 2018 को दोपहर करीब 3.30 बजे उत्‍तर प्रदेश के बस्‍ती रेलवे स्‍टेशन पहुंची तो रेल अधिकारी व स्‍टाफ हतप्रभ रह गए. रेलवे अधिकारीयों के अनुसार फर्टिलाइजर के इस कंसाइनमेंट को 1,326 किमी की दूरी तय कर मंजिल तक पहुंचने में करीब चार साल का वक्‍त लग गया. गुड्स ट्रेन में डी-अमोनियम फॉस्‍फेट के 1,316 बैग थे. जो 25 जुलाई को चार साल बाद अपने गंतव्य तक पहुंचे. अधिकतर बैग तो ट्रेन की इतनी देरी के कारण फट गए और उनमें फर्टिलाइजर जम गई.

रेलवे का कहना है की जब कोई वैगन या बोगी जर्जर हो जाती है तो उसे यार्ड में भेज दिया जाता है. लगता है इस ट्रेन की बोगियों के साथ भी यही हुआ होगा. आपको बता दें की इंडियन पोटाश लिमेटिड ने रामचंद्र गुप्ता के नाम पर माल बुक कराया था, जो उस वक्त कंपनी के हैंडिलिंग और बफर एजेंट थे. रेलवे पर खाद कंपनी की ओर से पहले ही दावा कर दिया गया था. हालांकि, 4 साल बाद खाद की दशा तो अच्छी नहीं रह गई, बावजूद इसके इंडियन पोटाश लिमेटिड इस पर अपनी दावेदारी जता रहा है.

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