आपका सबसे बड़ा दुश्मन है सोशल मीडिया, अभी संभल जाओ वरना भुगतने पड़ेंगे गंभीर परिणाम

आपका सबसे बड़ा दुश्मन है सोशल मीडिया, अभी संभल जाओ वरना भुगतने पड़ेंगे गंभीर परिणाम

आज तकनीक के प्रचार प्रसार और इन्टरनेट के बाद हमारी जिन्दगी में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है. बिना इन्टरनेट के अब जीवन की कल्पना भी मुश्किल सी लगती है. इन्ट...

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आज तकनीक के प्रचार प्रसार और इन्टरनेट के बाद हमारी जिन्दगी में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है. बिना इन्टरनेट के अब जीवन की कल्पना भी मुश्किल सी लगती है. इन्टरनेट ने जहाँ एक ओर हमारी जिन्दगी सरल और सुगम बना दी है वहीँ दूसरी ओर इसके दुष्प्रभाव भी अब सामने आने लगे हैं. इसी कड़ी में हम आज बात करते हैं सोशल मीडिया की.

सोशल मीडिया इन दिनों हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्‍सा बना गया है. बिना इसके हम खुद को अब असहाय और अकेला सा महसूस करने लगे हैं. हम में से ज्‍यादातर लोग अपने खाली समय का इस्‍तेमाल सोशल मीडिया में पोस्‍ट करने या पोस्‍ट पढ़ने में करने लगे हैं. चाहे व्हाट्सअप्प, इन्सटाग्राम हो या फिर फेसबुक या कोई अन्य, इन सभी का हमारे निजी जीवन में दखल कुछ हद से भी ज्यादा बढ़ गया है. नतीजतन, व्‍यक्तिगत जीवन में सोशल मीडिया के बढ़ते हस्‍तक्षेप ने हमारे शरीर में कुछ कुप्रभाव भी डालना शुरू कर दिए हैं.

अगर इनके कुप्रभावों की बात की जाए तो लिस्ट बहुत लम्बी हो सकती है लेकिन आज हम बात करेंगे सिर्फ एक कुप्रभाव की. जिनमें नींद न आने की समस्‍या भी है. अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि इस समस्‍या से परेशान हो चुके लोग इन दिनों अस्‍पतालों के चक्‍कर लगाकर अपनी नींद खोजने की कोशिश करने लगे हैं. सोशल मीडिया के चलते नींद आ आने की समस्‍या के बारे में इंद्रप्रस्‍थ अपोलो हॉस्पिटल के डॉ. तरुण कुमार साहनी का कहना है की आजकल इस प्रकार के केसों में काफी इजाफा हुआ है जिनमें अधिकतर केस सोशल मीडिया से प्रभावित है.

डॉ. साहनी के अनुसार मेडिकल साइंस में नींद की नींद की पूरी प्रक्रिया को स्‍लीप रिदम बोलते हैं. स्‍लीप रिदम के दो चरण होते हैं, जिसमें पहला चरण नॉन-रेम स्‍लीप (NREM) और दूसरा चरण रेम (REM) स्‍लीप का है. नॉन रेम स्‍लीप वह प्रक्रिया है जिसमें आप धीरे धीर गहरी नींद की तरफ जा रहे होते हैं. वहीं, जब आप गहरी नींद में चले जाते हैं, उस अवस्‍था को मेडिकल की भाषा में रेम स्‍लीप बोला जाता है. नॉन रेम स्‍लीप से रेम स्‍लीप की तरफ जाने के लिए पहली सबसे बड़ी जरूरत है कि दिमाग पूरी तरह से शांत हो. सोशल मीडिया आजकल इसी प्रक्रिया को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है. सोशल मीडिया के चलते, लोगों की नॉन-रेम स्‍लीप की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती है और वह रेम स्‍लीप यानी गहरी नींद की तरफ नहीं जा पाते हैं. अक्‍सर, यह भी देखा जाता है कि इस समस्‍या से परेशान लोग गहरी नींद आने के इंतजार में सोशल मीडिया के इस्‍तेमाल कर खुद ही अपनी नींद को भगाने में तुले रहते हैं.

इस बारे में डॉ. साहनी ने आगे बताया की हम अच्छी नींद ले पायें इसके लिए हमारे दिमाग का शांत रहना बहुत जरुरी है. उन्होंने कहा की अक्सर जब हम सोने जाते है तो तमाम प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद जैसे ही हम सोने के लिए बेड पर लेटते है तो सबसे पहले हमारा काम होता है की मोबाइल पर पोस्ट्स चेक करना. जबकि हमें मोबाइल अपने से दूर रखकर सोने की प्रक्रिया करने के बाद इसे हाथ लगाना तो दूर इसके बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. जबकि हम मोबाइल को अपने पास रखते है और कुछ लोग तो साइन पर रखते है. जैसे की किसी मेसेज की टोन बजी नहीं की आधी नींद में भी उसे खोलकर पढना शुरू कर देते हैं. हमारी यह आदत हमारे शरीर मे दो तरह से नकारात्‍मक प्रभाव डालती है. पहला नकारात्‍मक प्रभाव सोशल मीडिया में मौजूद कंटेंट की वजह से हमारी नींद पर पड़ता है.

दरसअल, जैसे जैसे हमारा मस्तिष्‍क शांत और एकाग्र होता है, वैसे वैसे हमे नॉन रेम स्‍लीप से रेम स्‍लीप की तरफ जाना शुरू कर देते हैं. नॉन रेम स्‍लीप को आप आम भाषा में नींद की हल्‍की झपकी भी बोल सकते हैं. लेकिन, सोशल मीडिया में मौजूद पोस्‍ट हमारे मस्तिष्‍क को शांत करने की जगह और तेज से चलाना शुरू कर देते हैं. पोस्‍ट पढ़ने के बाद, उसके बारे में हम अपनी राय सोंचना शुरू कर देते हैं. जिसके चलते दिमाग के शांत और एकाग्र होने की प्रक्रिया रुक जाती है. जिसका असर हमारी नींद पर पड़ता है.

इसकी दूसरी तरफ जब हम अँधेरे कमरे में मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं तो मोबाइल की स्क्रीन की तेज रौशनी (चाहे आपने मोबाइल का कंट्रास्ट कितना भी कम रखा हो) हमारी आँखों पर पड़ती है. जिसकी वजह से आँखों की तंत्रिकाएं दिमाग को भी सक्रिय कर देती है. नतीजतन ऐसा करने से हमारी आंख की रोशनी कमजोर होती है, दिगाम शांत नहीं होता और नींद भी हमसे कोसों दूर चली जाती है.

इसके साथ ही इसका एक खतरनाक पहलु ये भी है की जब हमें सोना होता है तो कई बार हम सोशल मीडिया के प्रयोग के दौरान कुछ ऐसी पोस्ट या फिर वीडियोज देख लेते हैं जो हमें अन्दर तक झकझोर कर रख देते हैं जैसे किसी हिंसक घटना का या कोई दुर्घटना का लाइव विडियो. एक बार जब हम ऐसे विडियो को देख लेते है तो दिमाग से विडियो के प्रभाव को तुरंत निकालना मुश्किल होता है जिसकी वजह से नींद हमसे कोसों दूर भाग जाती है और जब हमें मीठी सी नींद आई हुई होनी चाहिए थी उसकी बजाये हम उसी विडियो की उधेड़बुन में सारी-सारी रात सोचते हुए निकाल देते हैं.

हमने देखा होगा की ज्‍यादातर लोग सुबह हो या शाम सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं. सुबह जागने के बाद सबसे पहले उनका काम मोबाइल पर आए मैसेज और सोशल मीडिया के पोस्‍ट चेक करना होता है. यदि हम सुबह के समय अपने जीवन से मोबाइल फोन कर निकाल दें तो लोग सुबह जग कर घर से बाहर निकलेंगे, वॉक करेंगे, थोडा फ्रेश एयर लेगें. जिसका सकारात्‍मक असर हमारे शरीर और स्‍वास्‍थ्‍य पर भी पड़ेगा. इसी तरह, दिन में लोग काम के दौरान हर दो मिनट पर अपना मोबाइल फोन और उसमें आए मैसेज पढ़ना शुरू कर देते हैं. ऐसा करने से डिस्‍ट्रैक्‍शन पैदा होता है, जिससे हमारा काम, रेस्‍ट और हमारी स्‍लीप पर निगेटिव इंपैक्‍ट पड़ता है.